हास्य व्यंग्य कथा : बुधलाकोटी जी की पैंट

गौरव त्रिपाठी, युवा व्यंग्यकार
पर्वतीय कालोनी में उच्चकोटी के लोग रहते थे। बुधलाकोटी, कड़ाकोटी, डालाकोटी, नगरकोटी आदि आदि (उत्तराखंड में ये उपनाम हैं। )। कालोनी में मकान नंबर 27 में शेरदा बुधलाकोटी भी अल्मोड़ा के गांव से परिवार समेत आकर बसे थे। वे फौज में जाना चाहते थे, पर जा नहीं पाए। उनके अनुसार उनकी उंचाई थोड़ी कम थी और सीना कुछ ज्यादा चैड़ा। हालांकि सीने के साथ उनका पेट भी कम चैड़ा नहीं था। पेट ज्यादा न बढे इसलिए सुबह-सुबह मार्निंग वाॅक करने की उनकी पुरानी आदत थी। जाड़ा, गर्मी, बरसात चाहें जो भी हो, उनका तीन किलोमीटर चढ़ना उतरना रूटीन था।
  • अपने नाम की तरह शेरदा बुधलाकोटी जी काफी एंग्री मैन की भूमिका में रहते थे। चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूंछे उनके चेहरे को और भयानक बना देती थीं। लोगों में ये आम धारणा थी कि वे किसी भी बात पर वो हमेशा लड़ने को तैयार हो जाते हैं। गांव में कई बार लोग उनकी तेज आवाज सुनकर भाग जाते थे। हालांकि ये भ्रांति किसने फैलाई किसी को पता नहीं, लेकिन एक शोध के दौरान ये पता चला कि बिष्ट जी चाय वाले की दुकान पर बुधलाकोटी के डींगे हांकने के दौरान धीरे-धीरे ये धारणा लोगों में बनती चली गई। कई लोग उनके भयानक हाव-भाव को देखकर घबरा जाते थे।
  • बरसात का दिन था। नगर पालिका की मेहरबानी से सड़क पूरी तरह से कीचड़ से युक्त थी। पत्नी के मना करने के बावजूद बुधलाकोटी सुबह छह बजे मार्निंग वाॅक के लिए घर से निकल पड़े। रास्ते में पड़ोसी मोहनदा नगरकोटी मिल गए। बुधलाकोटी के गुस्से ( जो अब तक एक बार भी किसी ने नहीं देखा था) को लेकर वे काफी सहमे रहते थे।
  • मोहनदा-और दाज्यू प्रणाम। क्या चल रहा है भल।शेरदा-अभी तो फिलहाल मैं ही चल रहा हूं।…..मार्निंग वाॅक पर। मोहनदा समझ गए कि बुधलाकोटी जी का मूड ठीक नहीं है। इसलिए ज्यादा बात करना उचित नहीं है। दोनों थोड़ी दूर चले ही थे कि एक बाइक सवार सड़क पर कीचड़ उड़ाता हुआ फरार हो गया। ये देख बुधलाकोटी जी की आंखें गुस्से से लाल होने लगीं। मोहनदा घबरा गए। उन्होंने सोचा-कहीं बुधलाकोटी जी को गुस्सा न आ जाए और बाइक सवार से उलझ न जाएं।
  • मोहनदा बोले-जाने दीजिए बच्चे हैं। उधर, बुधलाकोटी जी बोले-बच गया। अगर मेरी पैंट पर कीचड़ पड़ जाती तो आज इसकी खैर नहीं थी।थोड़ी देर में एक कार सवार कीचड़ उड़ाता हुआ चल दिया। इस बार कीचड़ बुधलाकोटी जी के पैंट के उपर गिर गई। इस बार गुस्से से उनकी मूंछें तन गईं। बुधलाकोटी ने तेज से आवाज लगाने की कोशिश की, लेकिन कार वाला अपने शीशे बंद किए निकल चुका था। बोले-बच गया। पैंट पर नीचे ही छींटे आए। नहीं तो आज इसकी खैर नहीं थी। उधर, मोहनदा ने राहत की सांस ली।
  • अभी दोनों कीचड़ साफ करते हुए थोड़ा ही चल पाए थे कि एक टþक बुधलाकोटी की पूरी पैंट को कीचड़ से सानता हुआ आगे निकल गया। इससे तमतमाए बुधलाकोटी ने जब शेर की तरह दहाड़ लगाते हुए आवाज लगाई-ऐ रूक!
  • इस पर ट्रक थोड़ी दूर जाकर रूक गया। ट्रक के रूकते ही मोहनदा की हवा खराब हो गई। उसने सोचा-लगता है कि आज तगड़ा पंगा होगा। ट्रक ड्राइवर आज बुरी तरह पिटने वाला है। बीच बचाव में कहीं मैं भी न पिट जाउं। बुधलाकोटी ड्राइवर को पकड़ने के लिए तेजी से आगे बढ़े। थोड़ी देर में उन्हें दिखाई दिया कि ट्रक के अंदर से एक हट्टा कट्टा सन्नी देओल टाइप सरदार उतर रहा है। कमर पर उसके तलवार भी लटक रही है। यह देख बुधलाकोटी के भी पसीने छूट गए। वे आधे रास्ते में रूक गए और मोहनदा से बोले-चलो अब तो घर ही आ गया वरना आज इसकी खैर नहीं थी। उधर, ड्राइवर ट्रक से उतरकर सामने वाले ढ़ाबे पर चाय पीने चला गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published.