मैं जिन्दा हूँ”

बेशर्मी के हदों को
कुरेदते -कुरेदते
मनुष्य शब्द का
भयावह मुखौटा लगा
इज्जत का ताज पहने
फिर भी कहता “मैं”जिन्दा हूँ।।१
sonu upreti
हर नीड़ के मासूम
से शिशु को
भिखारी -सा बना
जूठन पे जीना सिखा
मंद मुस्कान भरते
फिर भी कहता “मैं”जिन्दा हूँ।।२
नग्न तन को ढकना छोड़
कुछ बचे चीथड़ों को
उधेड़-उधेड़ कर
नुमाइश तन की करा
दाँतों को भींचकर
फिर भी कहता” मैं”जिन्दा हूँ।।३
टूटती साँसों को
उम्मीदों की डोर
दिखाने के बजाय
तोड़ता -मरोड़ता
जहर सा उड़ेल
फिर भी कहता”मैं”जिन्दा हूँ।।४
दूसरे की अमानत पे
लार टपकाता
सजी धजी दीवारों पे
कालिख लगा
अपनी सभ्यता दिखाता
फिर भी कहता “मैं “जिन्दा हूँ।।५
सवालों के घेरे में
ऊँचे ओहदों की बात
उधार वाली जिंदगी
नए-नए लम्हों के
साजिशों के अध्याय रचता
फिर भी कहता “मैं”जिन्दा हूँ।।६
                                            सोनू उप्रेती”साँची
                                              बागेश्वर
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