कविता : मैं हूँ शिल्पी

Vashu pandey

मैं हूँ शिल्पी मुझे पत्थर को भगवान बनाना आता है
दुनिया से अलग अपनी एक पहचान बनाना आता है
चलता हूँ खार की राहों पर,न चाह है किसी दिलासा की
न चाहूँ तेरे फूल ही मैं,न आस किसी अभिलाषा की
मैं हूँ सक्षम,मुझे पतझड़ में भी फूल खिलाना आता है
मैं हूँ शिल्पी मुझे पत्थर को भगवान बनाना आता है..,,
है मनमौजी ये सर मेरा,हर दर पर कब ये झुकता है
हॉ,तुमसा नही ज़मीर मेरा बाज़ारों मे जो बिकता है
तू लाख दगा दुनिया को दे दुनिया तो बेचारी अन्धी है
पर भूल न जाना दोस्त मेरे रब को सब कुछ दिखता है
न सही मैं साजिद पर अपना ईमान बचाना आता है
मैं हूँ शिल्पी……
माना है दौलत पास नहीं गर्दिश में गुजारा होता है
बस्ती में जो सबसे छोटा हो,हॉ घर वो हमारा होता है
माना है चाहने वालों की ज़्यादा लम्बी फेहरिस्त नही
पर फिर भी पास जो होता है वो जान से प्यारा होता है
हर बेवस को अपने दिल का मेहमान बनाना आता है
मैं हूँ शिल्पी…….
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वाशु पाण्डेय
बहादुरगंज,फर्रूखाबाद (यू.पी)

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