अच्छी नौकरी छोड़ी, शादी ठुकराई और बन गए साधु

Indore (Agency): हर मां बाप का सपना होता है कि उसका बच्चा अच्छी पढ़ाई कर किसी अच्छे पद पर नौकरी करे और समाज में उनका नाम रोशन करे। मगर कभी कभी जीवन उस दिशा की ओर मुड़ जाता है जिसकी उम्मीद स्वयं व्यक्ति ने भी नहीं की होती है। धर्म अध्यात्म का असर व्यक्ति के जीवन पर इस कदर पड़ता है कि फिर वह अपना संपूर्ण जीवन समाज सेवा के लिए अर्पित कर देता है। इसके आगे बाकी सभी मोहमाया पीछे छूट जाती है।
मध्यप्रदेश में पहली बार रविवार को 70 मुमुक्षु और 20 दीक्षार्थियों की स्वागत यात्रा निकाली गई। इन दीक्षार्थियों में कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अच्छे ओहदे की नौकरी को भी ठोकर मार दी तो किसी ने अपनी शादी के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया और साधु जीवन अपना लिया। इनके स्वागत के लिए श्वेतांबर जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
एक वाटिका में आचार्य विजय कीर्तियश सूरीश्वर के सान्निध्य में मुमुक्षु और दीक्षार्थियों का बहुमान किया गया। इन्हें दीक्षा गुजरात के पालीताणा तीर्थ में दी जाएगी। संयोजक सुजानमल चैपड़ा ने बताया कि सांसारिक जीवन छोड़कर मोक्ष मार्ग पर जाने वालों को मुमुक्षु कहते हैं। इनमें जिन्हें जैन संत दीक्षा देने का निर्णय लेते हैं वे दीक्षार्थी कहलाते हैं। दीक्षा के बाद उन्हें संत की उपाधि मिल जाती है।
दीक्षा लेकर वैराग्य धारण करने वालों में कोई इवेंट कंपनी में उच्च पद पर था तो किसी ने सिविल इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। नासिक की इवेंट कंपनी में कार्यरत 26 साल की प्रियल बेन कहती हैं कि मेरे कारण किसी के मन को ठेस न पहुंचे इसलिए साधु जीवन अपनाने का निर्णय लिया। रितु मेहता कहती हैं कि मैं जब संत रामचंद्र सूरीश्वर की किताब का संपादन कर रही थी तो उसमें उनका जीवन चरित्र पढ़कर दीक्षा लेने का फैसला किया।

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