दुःखद : प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा नहीं रहे, कोरोना से हो गए थे संक्रमित

 

देहरादून : प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा ने शुक्रवार को अंतिम सांस ली। वह काफी दिनों से कोरोना से संक्रमित थे और एम्स में उपचार करा रहे थे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत व राज्यपाल ने दुख जताते हुए इसे देश का बड़ा नुकसान बताया।

पर्यावरण की रक्षा के लिए जीने वाले 95 वर्षीय सुंदरलाल बहुगुणा कोरोना संक्रमण की चपेट में नौ मई को आ गए थे। उनका ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उपचार चल रहा था। शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली।
न सिर्फ देश बल्कि दुनिया में प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के बड़े प्रतीक में शुमार सुंदरलाल बहुगुणा ने 1972 में चिपको आंदोलन को धार दी। साथ ही देश-दुनिया को वनों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप चिपको आंदोलन की गूंज समूची दुनिया में सुनाई पड़ी। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बहुगुणा का नदियों, वनों व प्रकृति से बेहद गहरा जुड़ाव था। वह पारिस्थितिकी को सबसे बड़ी आर्थिकी मानते थे। यही वजह भी है कि वह उत्तराखंड में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए छोटी-छोटी परियोजनाओं के पक्षधर थे। इसीलिए वह टिहरी बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं के पक्षधर नहीं थे। इसे लेकर उन्होंने वृहद आंदोलन शुरू कर अलख जगाई थी।
उनका नारा था-‘धार ऐंच डाला, बिजली बणावा खाला-खाला।Ó यानी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पेड़ लगाइये और निचले स्थानों पर छोटी-छोटी परियोजनाओं से बिजली बनाइये। सादा जीवन उच्च विचार को आत्मसात करते हुए वह जीवनपर्यंत प्रकृति, नदियों व वनों के संरक्षण की मुहिम में जुटे रहे। बहुगुणा ही वह शख्स थे, जिन्होंने अच्छे और बुरे पौधों में फर्क करना सिखाया्र, लेकिन कोरोना ने इस महान विभूति को हमसे छीन लिया।

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