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हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की दस्तक, 11 मामले आए सामने, जानें इस बीमारी के लक्षण और बचाव के उपाय

न्यूज जंक्शन 24, हल्द्वानी। कुमाऊं के साथ ही पूरे प्रदेश के लिए बड़ी खबर है। प्रदेश के नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिले में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (African swine fever in Haldwani and Udham Singh Nagar) की दस्तक हो गई है। दोनों जिलों में 11 मामले ट्रेस किए गए हैं। नैनीताल जिले के हल्द्वानी में चार और ऊधमसिंह नगर में सात मामले सामने आए हैं। इनमें सितारगंज में चार, बाजपुर, काशीपुर व दिनेशपुर एक-एक सुअर में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पुष्टि हुई है। इस वायरल संक्रमण है, जो संक्रमित सूअरों से सूअरों में ही फैलता है। इससे प्रशासन और पशुपालन महकमे में हड़कंप मच गया है।

पशुपालन विभाग के अपर निदेशक डा. वीसी कर्नाटक ने बताया कि पशुपालन विभाग ने जुलाई प्रथम सप्ताह में हल्द्वानी व ऊधम सिंह नगर सैंपल लेकर जांच के लिए भोपाल स्थित लैब भेजे थे। इसकी रिपोर्ट 24 जुलाई को पहुंची। रिपोर्ट में 11 सुअरों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पुष्टि हुई है। हल्द्वानी के जवाहर नगर में दो और नई बस्ती से दो सुअर संक्रमित पाए गए हैं। ऊधमसिंह नगर के सितारगंज से चार, बाजपुर, काशीपुर व दिनेशपुर एक-एक सुअर में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (African swine fever in Haldwani and Udham Singh Nagar) की पुष्टि हुई है।

डा. कर्नाटक ने बताया कि इसके बाद दोनों जिलों में पशु चिकित्साधिकारी के निर्देशन में टीमों का गठन कर लिया गया है। टीमों क्षेत्रों में बचाव व रोकथाम करने में जुट गई है। प्रदेश के गढ़वाल क्षेत्र में पहले ही अफ्रीकन स्वाइन फीवर के मामले सामने आ चुके हैं। इसके बाद पशुपालन निदेशक डा. प्रेम कुमार ने सात जुलाई को अलर्ट जारी कर दिया था। नैनीताल डीएम धीराज गर्ब्याल ने विभागीय अधिकारियों को मौके पर नियमित दौरा करने और रोकथाम के लिए विशेष इंतजाम करने के निर्देश दिए हैं।

क्या होता है अफ्रीकन स्वाइन फीवर और लक्षण

अफ्रीकन स्वाइन फीवर एक वायरल बीमारी है, जिसका असर जंगली और पालतू सूअरों में होता है। इस बीमारी में तेज बुखार के बाद दिमाग की नस फटने की वजह से सूअरों की मौत हो जाती है। इस रोग के होने के बाद सूअरों के बचने का प्रतिशत तकरीबन न के बराबर होता है। इसमें मृत्यु दर 100 प्रतिशत मानी जाती है। ये रोग एक से दूसरे सूअर के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। साथ ही अगर किसी संक्रमित सूअर ने कुछ खाकर छोड़ दिया हो और उसे कोई दूसरा स्वस्थ सूअर खा ले, तो भी ये रोग जाता है। ये रोग पहले के स्वाइन फीवर से अलग है। हालांकि लक्षणों में समानता है। इसी वजह से पहले वाले स्वाइन फीवर के लिए तैयार की गई वैक्सीन अफ्रीकन स्वाइन फीवर से ग्रसित सुअरों पर असर नहीं डाल रही है। ये बीमारी सूअरों के लिए बेहद खतरनाक है लेकिन अभी ये अन्य जानवरों में नहीं फैल रही है। अभी तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं तैयार हुई है। इसी वजह से सरकारें संक्रमित सुअरों को मार देने का आदेश दे रही हैं, जिससे अन्य स्वस्थ सुअरों को बचाया जा सके।

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