बरेली वालों से मात खा रहा कोरोना, वजह जानकर आप भी हो जाएंगे हैरान

पूरी दुनिया में कोहराम मचा रहा कोरोना वायरस बरेली वालों से मात खा रहा है। विशेषज्ञ इसको लेकर हैरान है। इसे शोध का विषय बता रहे हैं। बताया जा रहा है कि जहां मलेरिया का प्रकोप ज्यादा होता है वहां ये वायरस अपने पैर नहीं पसार पाता। कयास इसलिए लगाए जा रहे हैं, क्योंकि बरेली में हमेशा ही मलेरिया का प्रकोप रहा है। हालांकि, डॉक्टरों ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

बात करें आंकड़ों कि तो बरेली जिले में बीते दो साल में मलेरिया के 90 हजार से अधिक मरीज मिले हैं। दूसरी तरफ देखें तो कोविड-19 वायरस बरेली मंडल में काफी हद तक काबू में हैं। जबकि पड़ोसी जिले रामपुर, मुरादाबाद की बात की जाए तो कोरोना के मरीजों की संख्या अधिक है। डॉक्टर भी ये बात मानते हैं कि संक्रामक बीमारी मलेरिया के प्रकोप वाले कई जिलों में कोरोना मरीजों की संख्या अधिक नहीं है। बता दें कि कोरोना भी एक संक्रामक बीमारी है। डाक्टरों का ये भी कहना है कि कोरोना के मरीजों को मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भी दी जाती है। बताया जाता है कि मलेरिया के प्रकोप वाले इलाकों के लोगों में अन्य शहरों की अपेक्षा रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है। इसलिए यह वायरस यहां के लोगों से मात खा रहा है।

इस चैंकाने वाले तथ्य को लेकर आईसीएमआर की टीम भी बरेली जिले में कोविड-19 वायरस का असर देखने आएगी। यहां वह सोरो सर्विलांस करेगी। स्वस्थ्य हो चुके कोरोना संक्रमित मरीजों व उनका इलाक करने वाले चिकित्सकों से बात करेगी। मलेरिया प्रभावित इलाकों का भी दौरा कर सकती है।

असल मे मलेरिया प्रभावित इलाके में बड़े पैमाने पर मरीजों को क्लोरोक्वीन, प्राइमाक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा दी जाती है। बीते दो साल में बरेली में मिले 90 हजार मलेरिया मरीजों को ये दवा दी गईं।

बरेली में कोविड-19 संक्रमित परिवार को स्वस्थ करने वाली टीम के अहम सदस्य डा. बागीश वैश्य बताते हैं कि शासन की गाइड लाइन में भी मलेरिया की दवा मरीज को देने का निर्देश है। कोरोना संक्रमित कई मरीजों को इलाज के दौरान हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा दी भी गई।

राष्ट्रीय संक्रामक रोग चैप्टर के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. अतुल अग्रवाल बताते हैं कि जन्म से ही शरीर में टी-सेल होती है जो बाहर से आने वाले वायरस, बैक्टीरिया को खा जाते हैं। इसके पाचन में केमिकल निकलता है तो बी-सेल (बी-सेल की खासियत होती है कि 50 माइक्रान के क्षेत्र में कोई केमिकल अलग से दिखा तो सक्रिय होते हैं) एंटीबाडी बनाने का काम करते हैं। टी-सेल सक्रिय होता है तो शरीर में जितने तरह के इंफेक्शन आते हैं, उतने तरह के टी-सेल बन जाते हैं। किसी शरीर में अगर मलेरिया के टी-सेल हैं तो उससे मिलते-जुलते इंफेक्शन पर असर होगा। अब अगर मलेरिया की दवा कोरोना मरीज पर काम कर रही है तो मानना पड़ेगा दोनों वायरस की प्रकृति में कुछ न कुछ समानता है।

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