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सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर महाराष्ट्र की सियासत, कोर्ट ने बागी नेताओं से किया सवाल, डिप्टी स्पीकर पर भी तल्ख टिप्पणी

न्यूज जंक्शन 24, नई दिल्ली। महाराष्ट्र की सियासी लड़ाई बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है (Maharashtra  politics in the Supreme Court)। इस मामले में बागी नेता एकनाथ शिंदे गुट की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई। शिदे गुट ने डिप्टी स्पीकर के नोटिस को चुनौती दी है। इस पर कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर पांच दिन में जवाब मांगा है। महाराष्ट्र पुलिस को भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। बागी विधायकों को डिप्टी स्पीकर के नोटिस का जवाब देने के लिए तीन दिन का समय दिया है। कोर्ट अब इस मामले में 11 जुलाई को सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट की ओर से कहा गया है कि उनके पास 39 विधायकों का समर्थन है, ऐसे में सरकार अल्पमत में है। सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर पर तल्ख टिप्पणी की। कहा कि डिप्टी स्पीकर ने खुद सुनवाई की। खुद ही जज बन गए।

सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट ने कह कि उनके साथ 39 विधायक हैं। ऐसे में महाराष्ट्र सरकार अल्पमत में है (Maharashtra  politics in the Supreme Court)। बागी गुट ने कहा कि डिप्टी स्पीकर की छवि जब संदेह के घेरे में है तो फिर वह अयोग्य ठहराने का प्रस्ताव कैसे ला सकते हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई कुछ देर के लिए रोक दी गई। कुछ देर बाद सुनवाई दोबारा शुरू हुई तो जज ने कहा कि आप कह रहे हैं कि डिप्टी स्पीकर के खिलाफ 21 को प्रस्ताव दिया। ऐसे में उन्हें सुनवाई नहीं करनी चाहिए। आप यही बात डिप्टी स्पीकर को क्यों नहीं कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर पर तल्ख टिप्पणी भी की। कहा कि डिप्टी स्पीकर ने खुद सुनवाई की। खुद ही जज बन गए।

इस पर बागी विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का भी पुराना फैसला है। यह बात उन्हें बताई भी गई है। फिर भी उन्होंने कार्रवाई जारी रखी है। कौल ने कहा कि जब तक उन्हें हटाने के सवाल पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक डिप्टी स्पीकर को इस मुद्दे से निपटने का कोई अधिकार नहीं है। इस मामले में जो किया जा रहा है वह अनुचित जल्दबाजी, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम विधानसभा के सक्षम अधिकारी से जवाब मांगेंगे कि डिप्टी स्पीकर को प्रस्ताव मिला था या नहीं? क्या उस प्रस्ताव को उन्होंने खारिज कर दिया? क्या वह अपने ही मामले में जज हो सकते हैं? इसके बाद डिप्टी स्पीकर जीरवाल की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि डिप्टी स्पीकर ने ईमेल के माध्यम से भेजे गए उनके निष्कासन के प्रस्ताव की प्रमाणिकता पर सवाल उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, डिप्टी स्पीकर कार्यालय के सभी रिकॉर्ड हमारे सामने होने चाहिए।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव गुट के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से सवाल किया कि जब एक स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित है तो क्या वह ऐसे में आयोग्यता याचिकाओं पर फैसला कर सकता है? कोर्ट के सवाल पर सिंघवी ने 1961 में सुप्रीम कोर्ट के 8-न्यायाधीशों की बेंच के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा, उस बेंच के आदेश के मुताबिक जब तक स्पीकर अंतिम रूप से फैसला नहीं कर लेता तब तक उसकी कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।  कोर्ट ने कहा कि हमें समझाइए कि क्या जिस स्पीकर को हटाने की मांग की गई है, क्या वह खुद उस नोटिस पर फैसला कर सकता है? इसके जवाब में सिंघवी ने कहा कि हां, वह कर सकता है।

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